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September 8, 2026

Doon Daily News

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अव्यवस्थाओं का शिकार आयुर्वेद विवि! पीसीएस अफसर पद छोड़ने को मजबूर, छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ पर सिस्टम मौन!

उत्तराखंड आयुर्वेद विवि में छात्रों के आंदोलन के बीच अव्यवस्थाओं से परेशान कुलसचिव ने पद छोड़ने की इच्छा जताई, रिपोर्ट- नवीन उनियाल

देहरादून: आयुर्वेद के क्षेत्र में बड़ा दावा करने वाली सरकारों के लिए उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय एक आईना है. यहां स्थितियां इतनी बिगड़ चुकी हैं कि विश्वविद्यालय में कुलसचिव के पद पर तैनात PCS अफसर ने अपनी जिम्मेदारी से हाथ जोड़ने तक का मन बना लिया है. पिछले दिनों छात्रों का हंगामा भी इन्हीं परिस्थितियों की हकीकत को बयां करता है. जहां सैकड़ों छात्रों के भविष्य के साथ कॉलेजों ने खिलवाड़ किया, तो विश्वविद्यालय की निगरानी भी सवालों के घेरे में रही. ईटीवी भारत की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट.

अव्यवस्थाओं ने PCS अफसर को पद छोड़ने पर किया मजबूर! उत्तराखंड शासन में पीसीएस अफसर के पत्र से हड़कंप मचा हुआ है. आयुर्वेद विवि में कुलसचिव के पद पर तैनात शिव कुमार बरनवाल ने कार्मिक विभाग को चिट्ठी लिखकर अपनी जिम्मेदारी से हटने की इच्छा जताई है. इस दौरान उन्होंने विश्वविद्यालय में मौजूद तमाम अव्यवस्थाओं का भी इस पत्र में जिक्र किया है. साथ ही अपने स्वास्थ्य का भी हवाला दिया है.

उत्तराखंड आयुर्वेद विवि में क्या गड़बड़ है? वैसे उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय पहले से ही काफी ज्यादा चर्चाओं में है. फिलहाल विश्वविद्यालय की चर्चा उन सैकड़ों छात्रों के आंदोलन के कारण हो रही है, जिनका पिछले करीब 6 सालों से विश्वविद्यालय ने रिजल्ट ही जारी नहीं किया है. जाहिर है कि आयुर्वेद चिकित्सक के रूप में अपना भविष्य देखने वाले छात्र इन हालात में मानसिक परेशानी से गुजर रहे हैं. अब इनका आंदोलन काफी उग्र होता हुआ भी दिखाई दिया है.

कुलसचिव ने बताए हालात: बात केवल छात्रों की ही नहीं है, बल्कि यहां तैनाती लेने वाले कुलसचिव शिवकुमार बरनवाल की भी है. दरअसल विश्वविद्यालय में स्थितियां इतनी बिगड़ चुकी हैं कि सैकड़ों छात्रों के परिणामों को प्रबंधन की तरफ से जारी ही नहीं किया जा रहा है. हालत यह है कि अपनी तैनाती से कई साल पहले परीक्षा देने वाले छात्रों के परीक्षा परिणामों पर रजिस्ट्रार के रूप में हस्ताक्षर करने के लिए भी मौजूदा कुलसचिव शिवकुमार बरनवाल को मजबूर होना पड़ रहा है.

कुलसचिव पर छात्रों के पिछले सालों साल से परीक्षा परिणाम घोषित नहीं होने का ही दबाव नहीं है, बल्कि छात्रों के आंदोलन और तमाम आयुर्वेद से जुड़े कॉलेजों द्वारा गलत तरीके से छात्रों का एडमिशन करने और विश्वविद्यालय में पिछले समय से चली आ रही अव्यवस्थाओं को सुधारने का भी प्रेशर है.

कुलसचिव ने पद छोड़ने की इच्छा जताई: इन तमाम दबावों और अव्यवस्थाओं के कारण कुलसचिव को अपने स्वास्थ्य के लिए भी चिंता होने लगी है और इसी का जिक्र करते हुए उन्होंने अब इस पद से मुक्ति पाने का आवेदन शासन को कर दिया है. खुद शिव कुमार बरनवाल ने भी इसकी पुष्टि की है.

बीएएमएस के छात्र कर रहे हैं प्रदर्शन: हालांकि फिलहाल ताजा मामला BAMS से जुड़े छात्रों का ही है, जो पिछले कई दिनों से उग्र आंदोलन करते हुए दिखाई दिए हैं. कुलसचिव शिवकुमार बरनवाल ने बताया कि-

ऐसे तमाम कॉलेजों को नोटिस जारी किया गया है, जिन्होंने गैर काउंसलिंग वाले छात्रों का एडमिशन किया और अब वह छात्र विश्वविद्यालय में आंदोलन करने के लिए पहुंच रहे हैं. यदि यह कॉलेज छात्रों को विश्वविद्यालय के खिलाफ आंदोलन के लिए भड़काने का काम करते हैं, तो ऐसे कॉलेजों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी. साथ ही इनका एफीलिएशन भी रद्द किया जा सकता है.
-शिव कुमार बरनवाल, कुलसचिव, उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय-

8 आयुर्वेद कॉलेजों पर नियम के खिलाफ एडमिशन देने का आरोप: शिक्षा की नगरी में छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का यह मामला बेहद चौंकाने वाला है. हैरत की बात यह है कि प्रदेश के करीब 8 कॉलेजों ने नियमों के खिलाफ गैर काउंसलिंग के जरिए छात्रों का रजिस्ट्रेशन कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया.

हाईकोर्ट से परीक्षा की अनुमति मिली लेकिन रिजल्ट अटका: इस मामले में छात्रों के गलत तरीके से एडमिशन के बाद हाईकोर्ट से इन छात्रों को परीक्षा दिलाए जाने के लिए अनुमति मिल गई, लेकिन परीक्षा परिणाम पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है.

उत्तराखंड में कई आयुर्वेद कॉलेज जांच के घेरे में: उत्तराखंड में ऐसे कई कॉलेज जांच के घेरे में हैं, जहां विश्वविद्यालय की अनुमति और निर्धारित काउंसलिंग प्रक्रिया के बिना सैकड़ों छात्रों के दाखिले कराये गए. हैरानी की बात यह है कि इन छात्रों से फीस लेने के बाद उन्हें परीक्षा में भी शामिल कराया गया, लेकिन अब चार से 6 साल बीतने के बावजूद उनका परिणाम घोषित नहीं हो पा रहा है. ऐसे में छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है. न तो उन्हें अपनी डिग्री मिल पा रही है और न ही वे आगे की पढ़ाई या नौकरी के लिए इसका इस्तेमाल कर पा रहे हैं. सवाल यह है कि जब इन छात्रों के दाखिले के लिए विश्वविद्यालय की अनुमति ही नहीं थी, तो कॉलेजों ने एडमिशन कैसे कराए और परीक्षा में बैठने की अनुमति कैसे मिली? पूरे मामले में कॉलेजों की भूमिका के साथ विश्वविद्यालय की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.

छात्रों ने पूछा हमारी क्या गलती? इस मामले में संबंधित छात्रों का कहना है कि उनके द्वारा एडमिशन कराने के साथ ही पूरी फीस भरी गई है, लेकिन कॉलेज ने उन्हें गुमराह किया. छात्रों ने कहा कि विश्वविद्यालय की भी इसमें गलती है, क्योंकि BAMS के चार सालों में पहले दो सालों के रिजल्ट जारी किए गए. तीसरे और चौथे साल का रिजल्ट घोषित नहीं किया जा रहा है. यदि एडमिशन गलत थे और गलत तरीके से कॉलेज ने छात्रों का एडमिशन किया, तो पहले 2 सालों में परीक्षा परिणाम घोषित क्यों किए गए.

गलत कारणों से चर्चा में है आयुर्वेद विवि: इन तमाम विवादों को लेकर जहां पहले ही आयुर्वेद विश्वविद्यालय चर्चाओं में रहा है, तो वहीं अब विश्वविद्यालय के कुल सचिव के पात्र ने आयुर्वेद विश्वविद्यालय और इससे संबद्ध कॉलेज में चल रही अव्यवस्थाओं को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

दोषियों पर नहीं हुई कोई कार्रवाई: उधर इन हालातों के लिए जिम्मेदार अफसरों और कॉलेजों के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं दी गई है, जो कि सिस्टम में ऐसे मामलों को बढ़ावा देने के लिए भी प्रेरित कर रही है.

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