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September 3, 2026

Doon Daily News

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चीन सीमा से सटी दारमा घाटी में लैंडस्लाइड का हाई रिस्क, 9% क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील, जोखिम क्षेत्र में 58 फीसदी आबादी

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि दारमा घाटी में लैंडस्लाइड का खतरा ज्यादा है. आधे से ज्यादा आबादी हाई रिस्क में है. रिपोर्ट- रोहित सोनी.

देहरादून: नेपाल आई भीषण त्रासदी के बाद वैज्ञानिकों की हिमालयी राज्यों के प्रति चिंताई बढ़ गई है. हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन सबसे खतरनाक भू-वैज्ञानिक खतरों (Geological Hazards) में से एक है. पिछले कुछ दशकों में इनकी संख्या और तीव्रता, दोनों में काफी बढ़ोतरी हुई है, जिस कारण जानमाल को काफी अधिक नुकसान हुआ है. इसको लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून के वैज्ञानिकों ने पिथौरागढ़ जिले के दारमा घाटी में भूस्खलन के खतरे, संवेदनशीलता और उससे जुड़े जोखिम का अध्ययन किया है. अध्ययन के मुताबिक, दारमा घाटी का 9 फीसदी क्षेत्र काफी अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है.

22 फीसदी क्षेत्र को मध्यम जोखिम और 26 फीसदी क्षेत्र को कम जोखिम वाले जोन में रखा है. इसके अलावा 43 फीसदी क्षेत्र को बहुत कम जोखिम वाले जोन रखा है. देश के सीमांत पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी में भूस्खलन का खतरा केवल प्राकृतिक ढलानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी चपेट में सड़कें, बस्तियां, बांध और हजारों लोग भी हैं. दरअसल, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने पिथौरागढ़ जिले के दारमा घाटी क्षेत्र में भूस्खलन की संभावना को लेकर अध्ययन किया है.

जिसकी Machine Learning-Based Landslide Hazard and Risk Assessment in the Darma Valley, NW Himalaya (मशीन लर्निंग-बेस्ड लैंडस्लाइड हैजार्ड एंड रिस्क एसेसमेंट इन द दारमा वैली, एनडब्ल्यू हिमालय) अध्ययन रिपोर्ट जियोलॉजिकल जर्नल (Geological Journal) में प्रकाशित हुई है. इस अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक,

दारमा घाटी के करीब 9 फीसदी क्षेत्र में भूस्खलन का जोखिम हाई से वेरी हाई श्रेणी का है. जबकि घाटी की कुल आबादी का करीब 58 फीसदी आबादी इन्हीं जोखिम वाले क्षेत्रों में रह रही है.’

विकास कार्यों से बढ़ रहा खतरा: वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग, रिमोट सेंसिंग, बारिश और भूकंपीय तीव्रता के आंकड़ों को एकत्र कर दारमा घाटी में भूस्खलन का खतरा, भेद्यता और सामाजिक जोखिम का आकलन किया है. स्टडी के आधार पर वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया है कि विकास कार्यों, सड़क कटिंग, बढ़ते पर्यटन और संवेदनशील ढलानों पर निर्माण के कारण खतरा और अधिक बढ़ सकता है.

अध्ययन में खास बातें: दारमा घाटी का क्षेत्र करीब 1364 वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसकी लंबाई दारमा नदी के साथ करीब 91 किलोमीटर है. दारमा घाटी में तवाघाट, जम्कू, खेत, सोबला, दार, बालिंग,चांलकम, उर्थिंग, मंडप, नागलिंग, फिलम, दुग्तू, बौन, गोई, मर्च्छा, तिदांग और सिपु समेत कई गांव बसे हैं. अध्ययन में-

  • गांवों की ऊंचाई करीब 1150 मीटर से 3410 मीटर तक पाई गई है.
  • जबकि क्षेत्र का भू-आकृतिक विस्तार इससे भी अधिक ऊंचाई वाले हिस्सों तक है.
  • इस क्षेत्र में सालाना एवरेज बारिश 2000 से 2500 मिलीमीटर के बीच है.
  • कुल बारिश का करीब 82 फीसदी हिस्सा मॉनसून सीजन यानी जून से सितंबर के बीच का है.
  • खास बात है कि ये दारमा घाटी भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से जुड़ी है.
  • इसके साथ ही कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्रवेश मार्ग के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है.

23 साल के 295 भूस्खलनों का अध्ययन: वैज्ञानिकों ने साल 2001 से 2023 के बीच सैटेलाइट इमेज, गूगल अर्थ इमेजरी और क्षेत्रीय सर्वेक्षण के आधार पर घाटी में 295 भूस्खलनों का रिकॉर्ड तैयार किया. इन भूस्खलनों का कुल क्षेत्रफल करीब 4.9 वर्ग किलोमीटर पाया गया, जो अध्ययन क्षेत्र के करीब 0.36 फीसदी के बराबर है. भूस्खलनों का आकार 234 वर्ग मीटर से लेकर 3.2 लाख वर्ग मीटर तक पाया गया.

अध्ययन के मुताबिक,

  • 156 भूस्खलन उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाए गए.
  • 102 भूस्खलन टेथियन हिमालयी क्षेत्र.
  • 37 भूस्खलन लघु हिमालयी क्षेत्र में पाए गए.
  • करीब 86.47 फीसदी भूस्खलन 20 से 50 डिग्री ढलान वाले क्षेत्रों में थे.
  • करीब 90 फीसदी भूस्खलन 1500 से 4500 मीटर की ऊंचाई के बीच पाए गए.
  • इसके साथ ही सड़कों के 300 मीटर के दायरे में 36.48 फीसदी और जल निकासी क्षेत्रों के समीप 53.84 फीसदी भूस्खलन दर्ज किए गए.

ग्राउंड शेकिंग मॉडल में क्या पाया गया: इस अध्ययन में सिर्फ भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का नक्शा ही तैयार नहीं किया गया, बल्कि बारिश और भूकंपीय गतिविधि को भी इसमें शामिल किया गया. इसके लिए पिछले 40 सालों में हुई बारिश के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया. साथ ही भविष्य की संभावित 8.0 मैग्नीट्यूट की भूकंप आने की संभावना को देखते हुए ग्राउंड शेकिंग का मॉडल तैयार किया गया. इस दौरान पाया गया कि सिर्फ भूकंपीय तीव्रता को आधार मानने पर करीब 9 फीसदी क्षेत्र हाई से वेरी हाई हैजर्ड जोन में है और सिर्फ बारिश के आधार पर करीब 13 फीसदी हाई से वेरी हाई हैजर्ड जोन में है. लेकिन बारिश और भूकंप दोनों को साथ शामिल करने पर हाई से वेरी हाई हैजर्ड जोन बढ़कर करीब 32 फीसदी तक पहुंच गया. जिससे साफ है कि दारमा घाटी में भूस्खलन का खतरा किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कमजोर भूगर्भीय संरचना, ढलान, अत्यधिक बारिश, वॉटर सैचुरेशन और भूकंपीय झटकों के संयुक्त प्रभाव से तेजी से बढ़ सकता है.

अध्ययन में आर्थिक असुरक्षित होने का आकलन भी किया गया. इसमें सड़क, भवन, जल संरचनाएं, कृषि भूमि, वनस्पति और बांध को जोखिमग्रस्त परिसंपत्तियों के रूप में शामिल किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, बांध को सबसे अधिक संवेदनशील तत्व माना गया है. इसके बाद सड़कें और बस्तियां सबसे अधिक असुरक्षित पाए गए हैं. सड़क और भवनों को नुकसान होने पर उनकी मरम्मत और पुनर्निर्माण लागत काफी अधिक होने के कारण इनका जोखिम बढ़ जाता है. इसके अलावा, इस घाटी के गांव तवाघाट, जम्कू, खेत, सोबला, दार और बालिंग क्षेत्र में उच्च और अति उच्च नुकसान वाले क्षेत्र पाए गए हैं.

दारमा घाटी का जोखिम मैप: अध्ययन के अनुसार, भूस्खलन की चपेट में आने वाली सड़कें सिर्फ परिवहन व्यवस्था को प्रभावित नहीं करती, बल्कि दूरस्थ गांवों में बसे लोगों का संपर्क काटती है. दार गांव के नीचे राष्ट्रीय राजमार्ग के करीब 800 मीटर हिस्से के मलबे से क्षतिग्रस्त होने की वजह से कई घरों, सड़कों, स्कूलों और भवनों में भूस्खलन से दरारें भी आई थी. ऐसे में वर्षा और भूकंप दोनों को मिलाकर, वैज्ञानिकों ने दारमा घाटी का जोखिम मैप तैयार किया है.

मैप के अनुसार, वेरी हाई रिस्क में 5 फीसदी क्षेत्र, हाई रिस्क में 4 फीसदी, माध्यम जोखिम में 22 फीसदी, कम जोखिम में 26 फीसदी, बहुत कम जोखिम में 43 फीसदी क्षेत्र को रखा गया है. इस तरह कुल 9 फीसदी क्षेत्र हाई से वेरी हाई रिस्क श्रेणी में पाया गया है.

उच्च जोखिम वाले क्षेत्र मुख्य रूप से घाटी के दक्षिणी हिस्से में पाए गए हैं, जहां आबादी, सड़कें, विकास परियोजनाएं और कमजोर भूगर्भीय संरचनाएं एक-दूसरे के काफी करीब हैं. इसके उलट, उत्तरी हिस्सा अधिकतर हिमाच्छादित और कम आबादी वाला है. इसलिए वहां जोखिम दक्षिणी हिस्से के मुकाबले काफी कम पाया गया.

कितनी आबादी किस जोन में: वैज्ञानिकों ने साल 2011 की जनगणना के आधार पर सामाजिक जोखिम का आकलन किया है. जिसके मुताबिक कुल आबादी 4193 संवेदनशील क्षेत्रों में पाई गई है. इनमें से 13 फीसदी आबादी वेरी हाई रिस्क जोन में रहती है. इसके अलावा, 45 फीसदी आबादी हाई रिस्क जोन, 33 फीसदी आबादी मध्यम जोखिम, 6 फीसदी आबादी कम जोखिम के साथ ही मात्र 3 फीसदी आबादी वेरी लो रिस्क क्षेत्र में रहती है.

बारिश और भूकंप दोनों के संयुक्त प्रभाव को देखने पर सात गांवों की कुल 2486 आबादी हाई से वेरी हाई रिस्क जोन में पाई गई. यानी-

  • जम्कू गांव में रहने वाली 708 आबादी हाई रिस्क में है.
  • इसके अलावा, दार गांव की 560 आबादी वेरी हाई रिस्क.
  • खेत गांव की 504 आबादी हाई रिस्क.
  • नागलिंग गांव की 396 आबादी हाई रिस्क.
  • सोबला गांव की 189 आबादी हाई रिस्क.
  • बालिंग गांव की 129 आबादी हाई रिस्क और तवाघाट गांव की 119 आबादी हाई रिस्क में है.

इन सातों गांवों में रहने वाली आबादी, कुल आबादी का करीब 62 फीसदी है. अध्ययन में पाया गया कि करीब 58 फीसदी आबादी, हाई से वेरी हाई जोखिम वाले क्षेत्रों में रह रही है.

वैज्ञानिकों ने अध्ययन के आधार पर सुझाव दिए कि दारमा घाटी में भविष्य की सड़क, जलविद्युत, पर्यटन और आवासीय योजनाओं को जोखिम मानचित्रों के आधार पर ही स्वीकृति दी जानी चाहिए. विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में ढलान कटिंग, अनियंत्रित निर्माण, मलबा निस्तारण और जल निकासी व्यवस्था की अनदेखी स्थिति को गंभीर बना सकती है.

वैज्ञानिकों ने अध्ययन के आधार पर दिए सुझाव

  • दार, जम्कू, खेत, नागलिंग, सोबला, बालिंग और तवाघाट में गांव-स्तरीय भूस्खलन जोखिम सर्वेक्षण करना चाहिए.
  • सड़क कटिंग और चौड़ीकरण से पहले ढलान स्थिरीकरण की अनिवार्य योजना तैयार करनी चाहिए.
  • संवेदनशील सड़कों, पुलों और जलविद्युत ढांचे की नियमित निगरानी हो.
  • मॉनसून से पहले मलबा हटाने और वैकल्पिक संपर्क मार्गों की तैयारी हो.
  • वर्षा, भूस्खलन और भूकंपीय गतिविधि आधारित स्थानीय चेतावनी प्रणाली बने.
  • उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में नए निर्माण के लिए सख्त भू-तकनीकी जांच हो.
  • गांवों के लिए सुरक्षित निकासी मार्ग और आपदा आश्रय स्थलों का चिन्हीकरण हो.
  • उच्च रिजॉल्यूशन, करीब एक मीटर स्तर के आंकड़ों से गांव-वार जोखिम मानचित्र तैयार होना चाहिए.

ईटीवी भारत से बातचीत करते हुए वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक मो शावेज ने बताया कि, इस अध्ययन के जरिए दारमा वैली में भूस्खलन की वल्नरेबिलिटी और रिस्क एनालिसिस किया है. इसके लिए अलग-अलग मशीन लर्निंग मॉडल्स का इस्तेमाल किया है.

अध्ययन के लिए पहले संवेदनशीलता मैप बनाया गया. फिर रैनफॉल और अर्थक्वेक डेटा को इंटीग्रेट करके हजार्ड सिनेरियो निकला. साथ ही जोखिम वाले स्थानों को चिन्हित करके रिस्क मैप तैयार किया. अध्ययन में पाया गया कि तवाघाट से दार और सोबला तक का क्षेत्र भूस्खलन के लिहाज से काफी अधिक संवेदनशील है. साथ ही इस वैली का 9 फीसदी हिस्सा हाई टू वेरी हाई रिस्क क्षेत्र में शामिल है.
– मो. शावेज, वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, उत्तराखंड –

वैज्ञानिक शावेज के मुताबिक, यह पूरा क्षेत्र भूस्खलन के लिहाज से काफी अधिक संवेदनशील है. क्योंकि मॉनसून के दौरान इस क्षेत्र में अक्सर भूस्खलन होते रहते हैं. भूस्खलन एक प्राकृतिक घटना है जिसको रोका नहीं जा सकता, लेकिन मिटिगेशन मेजर्स (आपदा, जोखिम या संकट के प्रभाव को कम करने वाले उपाय) अपना सकते हैं.

अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने 15 फैक्टर्स को ध्यान में रखते हुए अध्ययन किया है, जिसमें मुख्य रूप से इस क्षेत्र का स्लोप काफी महत्वपूर्ण पाया है. इस क्षेत्र का स्लोप 40 से 45 डिग्री पर है. इसके अलावा, बारिश के साथ ही ये क्षेत्र भूकंप के लिहाज से जोन 5 में आता है. ऐसे में इन सभी फैक्टर्स को देखते हुए रिस्क मैप तैयार किया है. अगर ऐसे ही भूस्खलन होता रहा, तो उससे जान-माल का नुकसान होने की आशंका है.

बहरहाल, नेपाल में 26 अगस्त को आए भीषण जल प्रलय के बाद नेपाल और चीन सीमा से सटे इलाकों के लिए डिजास्टर स्टडी की जरूरत महसूस की जा रही है. ऐसे में वैज्ञानिक लगातार इलाकों से सटे सीमांत घाटियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अध्ययन कर रहे हैं. ऐसे में उत्तराखंड के वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने दारमा घाटी पर किए अध्ययन को लोगों के सामने साझा किया है.

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