मानसून से पहले सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम पर रोक, उत्तराखंड की आपदा चेतावनी व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
मई 2026 में लॉन्च की गई सेल ब्रॉडकास्ट सर्विस को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अगले आदेश तक अस्थायी रूप से निलंबित किया है
देहरादून: देश भर में सफल ट्रायल के बाद भी अचानक सरकार ने सेल ब्रॉडकास्ट अलर्ट सिस्टम पर रोक लगा दी है. यह एक एडवांस मोबाइल-आधारित आपदा चेतावनी सिस्टम है, जो आपदा के समय में एक साथ लाखों-करोड़ों लोगों के फोन पर चेतावनी मैसेज भेज सकता है.
मानसून से पहले सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम पर रोक: देशभर में मई 2026 में लॉन्च की गई सेल ब्रॉडकास्ट सर्विस को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने अगले आदेश तक अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है. यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब उत्तराखंड समेत देश के कई राज्यों में मानसून दस्तक देने वाला है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर आपदा के दौरान लोगों तक कुछ ही सेकेंड में चेतावनी पहुंचाने वाली इस आधुनिक तकनीक को क्यों रोका गया और इसका असर उत्तराखंड जैसे आपदा संवेदनशील राज्य पर कितना पड़ सकता है.
उत्तराखंड में दस्तक देने वाला है मानसून: उत्तराखंड में मानसून का मौसम शुरू होते ही आपदा प्रबंधन तंत्र की जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ जाती हैं. मौसम विभाग की चेतावनियों से लेकर नदी-नालों के जलस्तर और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की निगरानी तक, पूरा प्रशासनिक तंत्र अलर्ट मोड में आ जाता है. इसकी वजह भी साफ है. राज्य का भौगोलिक स्वरूप ऐसा है जहां कुछ मिनटों की भारी बारिश भी बड़ी आपदा का रूप ले सकती है. वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा, चमोली आपदा, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में बादल फटने की घटनाएं इस बात का उदाहरण हैं कि पहाड़ में समय पर मिली चेतावनी कितनी महत्वपूर्ण होती है.
उत्तराखंड की आपदा चेतावनी व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल: यही वजह थी कि केंद्र सरकार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), दूरसंचार विभाग (DoT), गृह मंत्रालय और सी-डॉट पिछले कई वर्षों से एक ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे थे, जो किसी भी संभावित आपदा क्षेत्र में मौजूद लोगों तक कुछ ही सेकेंड में चेतावनी पहुंचा सके. मई 2026 में देशभर में लॉन्च की गई सेल ब्रॉडकास्ट सर्विस को इसी दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना गया था. लेकिन लॉन्च के महज कुछ सप्ताह बाद ही इस सेवा को अस्थायी रूप से रोक दिए जाने के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है.
क्या है सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम? सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम मोबाइल नेटवर्क आधारित एक अत्याधुनिक चेतावनी तकनीक है. सामान्य एसएमएस प्रणाली में संदेश किसी विशेष मोबाइल नंबर पर भेजा जाता है, जबकि सेल ब्रॉडकास्ट में किसी व्यक्ति का नंबर जानने की आवश्यकता नहीं होती. इसके बजाय किसी भौगोलिक क्षेत्र को चिन्हित कर उस क्षेत्र में मौजूद सभी मोबाइल फोन पर एक साथ चेतावनी संदेश प्रसारित किया जाता है.
ये है सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम की विशेषता: इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह इंटरनेट पर निर्भर नहीं है. यदि मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध है, तो 2G, 3G, 4G और 5G सभी प्रकार के नेटवर्क पर यह काम कर सकती है. इसके अलावा नेटवर्क पर अत्यधिक दबाव होने की स्थिति में भी यह सामान्य एसएमएस की तुलना में अधिक प्रभावी मानी जाती है. यही कारण है कि अमेरिका, जापान और यूरोप के कई देशों में इस तरह की प्रणालियां वर्षों से आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
भविष्य की आपदा चेतावनी व्यवस्था: भारत में भी इसे भविष्य की आपदा चेतावनी व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा था. मई 2026 में इसके औपचारिक लॉन्च के दौरान केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इसे देश की आपदा प्रबंधन प्रणाली को “Reactive से Proactive” बनाने वाला कदम बताया था. इस तकनीक को सी-डॉट ने विकसित किया है और इसे NDMA तथा दूरसंचार विभाग के सहयोग से लागू किया गया.
ऐसे काम करता है सिस्टम, सचिव ने समझाया पूरा मॉडल: उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, यह प्रणाली लोकेशन आधारित अलर्ट मॉडल पर काम करती है.
जब किसी क्षेत्र में बादल फटने, भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, बिजली गिरने या किसी अन्य आपदा की आशंका होती है, तो सबसे पहले उस क्षेत्र को डिजिटल मैप पर चिन्हित किया जाता है. इसके बाद उस क्षेत्र का एक पॉलीगॉन तैयार किया जाता है और सी-डॉट तथा एनडीएमए द्वारा विकसित सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम के माध्यम से उस इलाके के मोबाइल टावरों से जुड़े सभी मोबाइल फोन पर एक साथ चेतावनी संदेश भेजा जाता है.
-विनोद सुमन, सचिव आपदा प्रबंधन-
सुमन ने बताया कि अलर्ट जारी होते ही मोबाइल फोन में विशेष प्रकार की बीप सुनाई देती है. यह सामान्य नोटिफिकेशन की तरह नहीं होती, बल्कि उपयोगकर्ता का ध्यान आकर्षित करने के लिए डिजाइन की गई है. जब तक व्यक्ति संदेश को पढ़कर स्वीकार नहीं करता, तब तक अलर्ट सक्रिय रह सकता है. जरूरत पड़ने पर बाद में भी संदेश को दोबारा देखा जा सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार-
इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि प्रशासन केवल उसी क्षेत्र को टारगेट कर सकता है, जहां खतरा मौजूद है. उदाहरण के लिए यदि केदारनाथ पैदल मार्ग, यमुनोत्री हाईवे या पिथौरागढ़ के किसी विशेष क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा हो, तो केवल उसी क्षेत्र में मौजूद लोगों को चेतावनी भेजी जा सकती है.
उत्तराखंड के लिए क्यों है बेहद महत्वपूर्ण? उत्तराखंड में इस तकनीक का महत्व सामान्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है. राज्य में हर वर्ष लाखों श्रद्धालु चारधाम यात्रा पर आते हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है, जो स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों से परिचित नहीं होते. मौसम का अचानक बदलना, पहाड़ों से मलबा आना, नदी का जलस्तर बढ़ना या किसी मार्ग का अचानक बाधित हो जाना आम घटनाएं हैं. ऐसी परिस्थितियों में यदि प्रशासन प्रभावित क्षेत्र में मौजूद सभी लोगों तक कुछ ही सेकेंड में चेतावनी पहुंचा सके, तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
यही वजह है कि आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी और विशेषज्ञ इस तकनीक को उत्तराखंड के लिए बेहद उपयोगी मानते रहे हैं. इसके अलावा यह तकनीक केवल स्थानीय निवासियों तक सीमित नहीं है. यदि कोई पर्यटक, यात्री या श्रद्धालु उस क्षेत्र में मौजूद है, तो उसे भी वही अलर्ट प्राप्त होगा. यही विशेषता इसे पारंपरिक एसएमएस आधारित चेतावनी प्रणालियों से अलग बनाती है.
फिर क्यों लगी रोक और क्या है विवाद? यही इस समय सबसे बड़ा सवाल है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 12 जून को एनडीएमए की ओर से एक एडवाइजरी जारी की गई, जिसके बाद सेल ब्रॉडकास्ट सर्विस को अगले आदेश तक अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया. आधिकारिक तौर पर इसे एहतियाती कदम बताया गया है. हालांकि एनडीएमए की ओर से रोक की विस्तृत वजह सार्वजनिक नहीं की गई है.
बताया जा रहा है कि सिस्टम के कुछ तकनीकी और प्रक्रियागत पहलुओं की समीक्षा की जा रही है. इसी कारण सेवा को अस्थायी रूप से रोका गया है. कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में अलर्ट प्रणाली से जुड़े कुछ मामलों ने अधिकारियों का ध्यान खींचा, जिसके बाद इसकी समीक्षा शुरू हुई. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए फिलहाल इतना ही स्पष्ट है कि सेवा को तकनीकी और प्रक्रियागत समीक्षा पूरी होने तक निलंबित किया गया है.
बड़ा सवाल, मानसून के बीच क्या मिलेगा इस तकनीक का लाभ? उत्तराखंड जैसे आपदा संवेदनशील राज्य में यह मामला केवल एक तकनीकी सेवा के निलंबन का नहीं है. यह सीधे उस व्यवस्था से जुड़ा है, जिसके माध्यम से भविष्य में लाखों लोगों तक आपदा से पहले चेतावनी पहुंचाई जानी थी. ऐसे समय में जब राज्य में मानसून सक्रिय होने वाला है और चारधाम यात्रा भी जारी है, इस सेवा पर लगी रोक ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
क्या यह केवल कुछ दिनों की तकनीकी समीक्षा है या फिर प्रणाली में कोई बड़ा बदलाव होने जा रहा है? क्या मानसून के दौरान उत्तराखंड को इस तकनीक का लाभ मिल पाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या भविष्य में आपदा चेतावनी व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाकर दोबारा लागू किया जाएगा? इन सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना जरूर है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां कई बार कुछ मिनटों की चेतावनी भी दर्जनों जिंदगियां बचा सकती है, वहां सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम पर लगी यह रोक चर्चा का बड़ा विषय बन गई है.
