उत्तराखंड में 10 साल में 4662 स्थानों पर हुआ भूस्खलन, 319 लोगों ने गंवाई जान

आपदा की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में वर्षाकाल के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की डरावनी तस्वीर है। कब कहां अतिवृष्टि से जमीन दरक जाए, कहा नहीं जा सकता। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। एक जनवरी, 2015 से अब तक के परिदृश्य को देखें तो राज्य में 4662 स्थानों पर भूस्खलन से बड़े पैमाने पर क्षति हुई है। पौड़ी जिले में भूस्खलन की सर्वाधिक 2040 घटनाएं हुईं, जबकि नैनीताल (सात) में सबसे कम। राज्यभर में अब तक भूस्खलन की चपेट में आकर 319 व्यक्तियों की जान जा चुकी है, जबकि 192 लोग घायल हुए और 19 लापता हैं। घरों, गोशालाओं, मवेशियों, कृषि भूमि, सड़कों समेत अन्य परिसंपत्तियों को भी नुकसान पहुंचा है।
उत्तराखंड में हर साल औसतन 1529 मिलीमीटर वर्षा होती है, इसमें 1121 मिलीमीटर का योगदान अकेले वर्षाकाल के चार महीनों का है। यही नहीं, बीते कुछ वर्षों से वर्षा के पैटर्न में भी बदलाव दिख रहा है। पूर्व में सप्ताहभर तक चलने वाली झड़ी अब बेहद कम हो गई हैं। स्थिति यह है कि कुछ जगह अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कुछ में बेहद कम। अतिवृष्टि व बादल फटने से भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ी हैं। इन्हीं में अधिक क्षति हो रही है।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों पर जिलेवार नजर दौड़ाएं तो भूस्खलन की दृष्टि से पौड़ी जिला अधिक संवेदनशील है, जहां साढ़े 10 वर्ष में 2040 स्थानों पर भूस्खलन हुआ। दूसरे स्थान पर पिथौरागढ़ है, जहां 1426 घटनाएं हुई हैं। अलबत्ता, नैनीताल जिला ऐसा है, जहां इस अवधि में भूस्खलन की सात घटनाएं हुई हैं।